9 सूत्रीय मांगों को लेकर छग राज्य शासकीय पीडीएस संघ की 5 जुलाई से बेमुद्दत हड़ताल

रायपुर। अपनी 9 सूत्रीय मांगों को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य शासकीय उचित मूल्य दुकान संचालकों ने 5 जुलाई से बेमुद्दत हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया है। अपनी मांगों को लेकर उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, खाद्य मंत्री दयालदास बघेल और वित्त मंत्री ओपी चौधरी को ज्ञापन सौंपा है। 3 माह के एकमुश्त वितरण का विरोध करते हुए शक्कर के लिए जो 17 रुपये लिया जाता है उसकी जगह 20 रुपये किया जाए।
इस संबंध में संघ द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार उन्होंने बताया कि कई बार उचित मूल्य दुकानदार संचालकों ने अपनी समस्याओं से प्रशासन और संबंधित विभाग को अवगत कराया था। इसके अलावा उन्होंने सरकार के मंत्रियों को भी ज्ञापन सौंपा जिस पर अभी तक कोई उचित निर्णय नहीं लिए जाने के कारण संघ ने 5 जुलाई से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया है। यह निर्णय संघ ने संचालकों की संपन्न हुई बैठक में लिया है। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो पूरे छत्तीसगढ़ में राशन दुकानों पर तालाबंदी के आसार स्पष्ट नजर आ रहे है।
संघ के अध्यक्ष नरेश बाफना ने सपाट शब्दों में कहा है कि अपनी मांगों से संबंधित उन्होंने ज्ञापन मुख्यमंत्री सहित संबधित विभागीय मंत्री और वित्त मंत्री को भी दिया है, इस ज्ञापन पर अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है जिसके चलते राशन दुकानदार अनिश्चितकाल के लिए हड़ताल पर जाने बाध्य है और इसकी पूरी जवाबदेही शासन और प्रशासन की होगी।
ये है 9 सूत्रीय मांगे
राशन दुकानदार गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। समय पर बारदाना राशि, मार्जिन मनी, आधार प्रमाणित वितरण राशि और वित्तीय पोषण राशि का भुगतान नहीं किया जा रहा है। मार्जिन राशि पिछले लगभग 20 वर्षों से नाममात्र भी नहीं बढ़ाई गई है। वर्तमान में सीजीएफएसए में 30 प्रति क्विंटल और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में 90 प्रति क्विंटल मार्जिन दिया जा रहा है, जो कि बेहद कम है। संघ ने दोनों में समान मेहनत का हवाला देते हुए इसे कम से कम 150 प्रति क्विंटल करने और दुकान संचालकों व विक्रेताओं का बीमा कराने की मांग की है। (नोट में उल्लेख है कि नवंबर 2025 के बाद से पिछले 7 महीनों की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम मार्जिन मनी अभी तक नहीं मिली है)।
राशन के आवंटन में भारी अनियमितता बरती जा रही है। वर्तमान में लागू एम पद्धति के कारण पूरा आवंटन नहीं मिल पाता है, जिससे ‘वन नेशन वन राशन कार्डÓ योजना का औचित्य ही खत्म हो रहा है। इसके कारण दुकानदारों और उपभोक्ताओं के बीच आए दिन विवाद व शिकायतें होती हैं। इस पद्धति को तुरंत बंद करने की मांग की गई है।
गोदामों (भंडारण) से राशन दुकानदारों को धर्मकांटा से वजन करके राशन दिया जाता है, लेकिन दुकान संचालक उपभोक्ताओं को 1-1 किलो तौलकर राशन बांटते हैं, जिससे स्टॉक में स्वाभाविक रूप से कमी (घटती) आती है। दुकानदारों ने इसके लिए कम से कम 1 प्रतिशत क्षतिपूर्ति (सूखत/कमी) दिए जाने की मांग रखी है।
शक्कर वितरण पर मिलने वाला कमीशन वर्तमान में महज 4 पैसा प्रति राशन कार्ड प्रति किलो है, जो कि व्यावहारिक नहीं है। इसे बढ़ाकर कम से कम ?100 प्रति क्विंटल करने और शक्कर का बिक्री मूल्य 17 रुपये के स्थान पर 20 रुपये करने की मांग की गई है ताकि चिल्हर (छुट्टे पैसों) को लेकर होने वाला विवाद समाप्त हो सके।
अगस्त 2016 से नवंबर 2016 के बीच की बढ़ी हुई कमीशन राशि आज दिनांक तक लंबित है, जिसे तत्काल जारी करने का आग्रह किया गया है।
अलग-अलग योजनाओं (जैसे एपीएल, सीजीएफएसए, एनएफएसए) का चावल होने के कारण उपभोक्ताओं और दुकानदारों में भ्रम व विवाद की स्थिति बनती है। उपभोक्ता को लगता है कि स्टॉक होने के बावजूद राशन नहीं दिया जा रहा है। संघ की मांग है कि माह के अंत में कुल वितरित चावल की गणना कर एक ही घोषणा पत्र संधारित किया जाए।
राजनीतिक दबाव (मंत्रियों व विधायकों) के चलते अधिकारियों द्वारा कई बार दुकान संचालकों पर झूठे प्रकरण बनाकर प्राथमिकी दर्ज करा दी जाती है। संघ की मांग है कि पी.डी.एस. संघ के पदाधिकारियों से चर्चा और निष्पक्ष जांच के बाद ही उचित होने पर ही कोई कानूनी कार्रवाई की जाए।
राज्य में तीन महीने का राशन एक साथ बांटने की व्यवस्था को अव्यावहारिक बताया गया है। इससे नान (नागरिक आपूर्ति निगम) द्वारा समय पर भंडारण नहीं हो पाता, दुकानदारों की मेहनत और समय तीन गुना बढ़ जाता है, उपभोक्ताओं को लंबी लाइनों में लगना पड़ता है और गरीब उपभोक्ताओं के घर कच्चे होने के कारण अनाज खराब होने का डर रहता है। अत: 3 माह के एकमुश्त वितरण की अनुमति न दी जाए।
राशन वितरण के दौरान पॉस मशीन में कभी लिंक फेल होने, कभी सर्वर डाउन रहने तो कभी उपभोक्ताओं के अंगूठे का निशान (बायोमेट्रिक) न लेने के कारण घंटों लाइनें लगी रहती हैं। इससे मजदूरों की दिहाड़ी छूटती है और समय व पैसे दोनों का नुकसान होता है। इस अव्यवस्था की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।