संपादक अनिल पुसदकर की कलम से, ये मेरी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और भावनाएं है

ये मेरी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है,भावनाएं है,इसका दलगत राजनीति और पार्टीगत राजनीति से कोई लेना देना नहीं।

मृत्यु को हम अशुद्ध मानते है और मृत्यु उपरांत उस परिवार या गोत्रज को तेरहवीं या अन्य मान्य पूजा पद्धति/परंपरा के पहले शुद्ध नहीं माना जाता और शुभ कार्यों को वर्जित माना जाता है।
पर ऐसा क्या हुआ जो अजित दादा पवार की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को उप मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने से पहले तेरहवीं या शुद्धिकरण के किसी भी कार्यक्रम का इंतजार नहीं किया जा रहा है?
क्या मान्य परम्पराओं के अनुसार अजित दादा की पत्नी को शुद्ध हुए बिना उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाना जायज है,या जरूरी है,या क्या दादा की तेरहवीं तक भी इंतजार नहीं किया जा सकता था?

खैर सबकी अपनी अपनी ढपली है और अपना अपना अपना राग,पर मुझे लगा कि चाहे व्यक्तिगत ही क्यों न हो अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना जरूरी है।आप का क्या कहना है,बताइएगा जरूर।