उस दिन आरोपी ने रास्ते में छात्रा को घेरकर कुदाली से सिर और सीने पर बेरहमी से वार किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई। स्थानीय लोगों और परिवार के प्रयासों से घायल छात्रा को तुरंत दुर्ग के सेक्टर 9 अस्पताल और बाद में रामकृष्ण अस्पताल, रायपुर ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया।
घटना के बाद पुलिस ने आरोपी की गिरफ्तारी के लिए सघन जांच शुरू की। इस दौरान छात्रा की सहेली, ट्यूशन टीचर्स और कई प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ की गई। आरोपी के कपड़ों और घटना स्थल से बरामद कुदाली पर मिले खून का डीएनए परीक्षण कराया गया, जिसमें पुष्टि हुई कि खून पीड़िता का ही था। मामले में एक जागरूक नागरिक की गवाही निर्णायक साबित हुई, जिसने घटना के दिन आरोपी को खून से सने कपड़ों में देखा था और बाद में पुलिस के समक्ष घटना की पुष्टि की।
सत्र न्यायालय ने आरोपी को, जो घटना के समय नाबालिग था लेकिन बालिग होने के बाद मुकदमे का सामना कर रहा था, भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी करार दिया। 7 फरवरी 2024 को अदालत ने उसे 20 वर्ष के कठोर कारावास और 2000 रुपये जुर्माने के साथ धारा 201 के तहत 1 वर्ष के कारावास और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में इस सजा के खिलाफ अपील की। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की खंडपीठ ने मामले की गहन समीक्षा की और ठोस सबूतों और गवाहियों के आधार पर सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सजा पूरी तरह विधि सम्मत है और जघन्य अपराध के लिए कठोर दंड आवश्यक है।
यह मामला समाज में महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अपराधियों को कानून का सख्त संदेश देने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। आरोपी के खिलाफ त्वरित कार्रवाई और सख्त सजा से यह स्पष्ट होता है कि न्याय प्रणाली ऐसे अपराधों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखती।