“महाराष्ट्र कैबिनेट विस्तार में नाराजगी, भाजपा विधायक गोपीचंद पडलकर ने खारिज की अटकलें”
नागपुर : महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन में हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार के बाद से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली नई सरकार में 10 मंत्रियों को स्थान नहीं मिल पाया, जिसके बाद पार्टी में नाराजगी की आहटें सुनाई देने लगीं। इनमें भाजपा विधायक गोपीचंद पडलकर भी शामिल हैं, जिन्होंने मंत्रिमंडल में स्थान न मिलने की अटकलों को सिरे से खारिज किया है। पडलकर ने अपने समर्थकों से धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा कि वह पार्टी के फैसले का सम्मान करेंगे और अपनी प्राथमिकताएं—धनगर समुदाय को आरक्षण और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर काम जारी रखेंगे।
सांगली जिले के जाट विधानसभा क्षेत्र के विधायक गोपीचंद ने कहा कि वे मंत्री बनने की उम्मीद के बावजूद पूरी तरह से पार्टी नेतृत्व, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ हैं। उन्होंने बताया कि वह आगामी चुनावों के लिए अपने प्रयास जारी रखेंगे और इन मुद्दों के समाधान के लिए काम करते रहेंगे। पडलकर के बयान से यह साफ होता है कि वे पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।
वहीं, कैबिनेट विस्तार में शामिल न होने पर कुछ अन्य नेताओं और उनके समर्थकों की नाराजगी साफ तौर पर देखी जा रही है। खासकर, पूर्व मंत्री छगन भुजबल के समर्थक गुस्से में हैं। भुजबल ने भी आने वाले समय में अपनी रणनीति तय करने के संकेत दिए हैं। इसके अलावा, अन्य मंत्रियों जैसे दिलीप वाल्से, सुधीर मुंनगटीवार, और विजय कुमार गावित को भी नई कैबिनेट में स्थान नहीं मिला। हालांकि, विपक्षी नेताओं और समर्थकों के विरोध के बावजूद फडणवीस ने अपनी टीम में 39 नए मंत्रियों को जगह दी है, जिसमें भाजपा से 19, शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना से 11 और अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा से 9 विधायक शामिल हैं।
नई कैबिनेट में पिछले मंत्रियों को हटाकर 16 नए चेहरे शामिल किए गए हैं, जिससे पार्टी में बदलाव की हवा चली है। इन परिवर्तनों से राज्य में आंतरिक विवाद और समर्थकों का विरोध सतह पर आ गया है, हालांकि पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री फडणवीस ने इसे सामान्य घटनाक्रम बताया है और पार्टी की समृद्धि के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
इस राजनीतिक उथल-पुथल को देखते हुए यह स्पष्ट है कि महाराष्ट्र में आगामी चुनावों के लिए शह और मात का खेल जोरों पर है, और राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए हर नेता अपनी रणनीति तैयार करने में जुटा है।
